बदलते परिवेश में उनकी युवा पीढी भी भेड पालन को नहीं है तैयार
अंबेडकरनगर। प्राचीन काल से एक ही बिरादरी के लोग भेड पालने का कार्य करते चले आ रहे हैं। वनो के विनाश, वंजर खलिहान, आदि की खाली पड़ी जमीन पर खेती होने से शहर से लेकर गांव तक कहीं पर भी कुछ भी जमीने खाली नहीं है। जिससे भेड पालने वाले (गडेरियो) के लिए मुसीबत बनी हुई है। अब ये अपनी भेडो को लेकर कहाँ जायँ यह प्रश्न तो बडा ही जटिल है। तहसील टांडा के ग्राम पंचायत हिथूरी दाउदपुर निवासी राम सरन पाल, राम जगत पाल राम सूरत पाल के परिवार में वंश परंमपरा के अनुसार पीढियो से भेड पालन का कार्य होता चला आ रहा है मगर वर्तमान समय में चरागाहो की कमी के कारण इन लोगों का भी मन भेड पालन से हटने लगा है।
उक्त लोगों का कहना है कि आज के १० वर्ष पहले किसान अपने खेतो में रात को भेड रखने का काम करते थे जिससे उनके खेतो की मिट्टी उपजाऊ होती थी। परंतु रासायनिक खादो और कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से भेडो की आवशयकता धीरे धीरे समाप्त हो गयी। जिससे भेड पालको की होने वाली आमदनी पर भी असर आ गया। मगर बदलते परिवेश के साथ उनकी युवा पीढी भी अब इस कार्य को करने को लेकर राजी नहीं है ।कुछ पाल युवको दिलीप कुमार पतिराम, सतीराम, राजितराम आदि (गडेरियो) से जब इस संदर्भ में बात किया गया तो उन्होंने बताया कि धूप, वारिश, जाडे के मौसम में पूरे दिन भेडो को चराने के लिए उनके आगे पीछे दौडना पड़ता है और मिलने को कुछ भी नहीं मिलता है ।इस तरह से हम लोग बाहर जाकर दूसरा व्यवसाय करने लगे हैं। जिससे हमारी आमदनी में भी सुधार आ गया है ।भारत में ही नही विदेशो में भी भेड केवल दो कार्यो के लिए पाली जाती है एक मांस और दूसरे ऊन के लिए मगर चरागाहो की कमी होना और युवाओं का भेडो के प्रति उदासीन होना भेड परजातियो के लिए भी मुसीबत बना हुआ है। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि चरागाहो के साथ ही साथ भेडो की परजातियो पर भी असर पडेगा जो पर्यावरण के लिए भी हानिकारक साबित हो सकता है ।क्यों कि हर व्यवसाय को दूसरे अन्य जाति वर्ग के लोग अपना मान कर व्यवसाय को आगे बढाते हुए कार्य को कर रहे हैं ।मगर भेड पालन का व्यवसाय केवल एक ही बिरादरी पर शुरू से लेकर वर्तमान समय तक कायम रहा । इसका कारण यह रहा कि मेहनत अधिक और आमदनी कम इसलिए दूसरे वर्ग के लोगों ने इसे नहीं अपनाया ।जो केवल एक ही बिरादरी तक सीमित रह गयी ।
अंबेडकरनगर। प्राचीन काल से एक ही बिरादरी के लोग भेड पालने का कार्य करते चले आ रहे हैं। वनो के विनाश, वंजर खलिहान, आदि की खाली पड़ी जमीन पर खेती होने से शहर से लेकर गांव तक कहीं पर भी कुछ भी जमीने खाली नहीं है। जिससे भेड पालने वाले (गडेरियो) के लिए मुसीबत बनी हुई है। अब ये अपनी भेडो को लेकर कहाँ जायँ यह प्रश्न तो बडा ही जटिल है। तहसील टांडा के ग्राम पंचायत हिथूरी दाउदपुर निवासी राम सरन पाल, राम जगत पाल राम सूरत पाल के परिवार में वंश परंमपरा के अनुसार पीढियो से भेड पालन का कार्य होता चला आ रहा है मगर वर्तमान समय में चरागाहो की कमी के कारण इन लोगों का भी मन भेड पालन से हटने लगा है।
उक्त लोगों का कहना है कि आज के १० वर्ष पहले किसान अपने खेतो में रात को भेड रखने का काम करते थे जिससे उनके खेतो की मिट्टी उपजाऊ होती थी। परंतु रासायनिक खादो और कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से भेडो की आवशयकता धीरे धीरे समाप्त हो गयी। जिससे भेड पालको की होने वाली आमदनी पर भी असर आ गया। मगर बदलते परिवेश के साथ उनकी युवा पीढी भी अब इस कार्य को करने को लेकर राजी नहीं है ।कुछ पाल युवको दिलीप कुमार पतिराम, सतीराम, राजितराम आदि (गडेरियो) से जब इस संदर्भ में बात किया गया तो उन्होंने बताया कि धूप, वारिश, जाडे के मौसम में पूरे दिन भेडो को चराने के लिए उनके आगे पीछे दौडना पड़ता है और मिलने को कुछ भी नहीं मिलता है ।इस तरह से हम लोग बाहर जाकर दूसरा व्यवसाय करने लगे हैं। जिससे हमारी आमदनी में भी सुधार आ गया है ।भारत में ही नही विदेशो में भी भेड केवल दो कार्यो के लिए पाली जाती है एक मांस और दूसरे ऊन के लिए मगर चरागाहो की कमी होना और युवाओं का भेडो के प्रति उदासीन होना भेड परजातियो के लिए भी मुसीबत बना हुआ है। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि चरागाहो के साथ ही साथ भेडो की परजातियो पर भी असर पडेगा जो पर्यावरण के लिए भी हानिकारक साबित हो सकता है ।क्यों कि हर व्यवसाय को दूसरे अन्य जाति वर्ग के लोग अपना मान कर व्यवसाय को आगे बढाते हुए कार्य को कर रहे हैं ।मगर भेड पालन का व्यवसाय केवल एक ही बिरादरी पर शुरू से लेकर वर्तमान समय तक कायम रहा । इसका कारण यह रहा कि मेहनत अधिक और आमदनी कम इसलिए दूसरे वर्ग के लोगों ने इसे नहीं अपनाया ।जो केवल एक ही बिरादरी तक सीमित रह गयी ।


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