जिले में भयावह रूप धारण करता जा रहा डेंगू
टाण्डा व जलालपुर सबसे ज्यादा प्रभावित
अम्बेडकरनगर। डेंगू जैसे जानलेवा बुखार से जहां पूरा जिला जूझ रहा है। इस बुखार से अब तक जिले में आधा दर्जन से अधिक लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं। दर्जनो लोग राजधानी समेत अन्य शहरो में स्थित चिकित्सालयो मेें जीवन और मौत के बीच संघर्श कर रहे है। वहीं जिले का स्वास्थ्य महकमा इस बीमारी पर रोकथाम के लिए अभी तक कोई कारगर व्यवस्था नहीं कर सका है। डेंगू की पुश्टि होने के बाद मरीज को मुख्य रूप से प्लेटलेट्स की आवश्यकता होती है जो न तो जिला चिकित्सालय में उपलब्ध है और न ही राजकीय मेडिकल कालेज में। कहने को तो सरकार इस बीमारी से निपटने के प्रति जोरशोर का दावा कर रही है लेकिन हकीकत इससे निपटने की कोई भी कारगर उपाय आज तक नहीं किया गया।
चिकित्सको के अनुसार डेंगू के मच्छर आमतौर पर दिन के उजाले में ही लोगों को काटते है लेकिन मच्छरो के प्रकोप को कम करने के लिए नगर पालिका प्रशासन द्वारा अभी तक शहर में फागिंग की व्यवस्था नहीं करायी गयी है। फागिंग न होने के कारण जिला मुख्यालय के कुछ मोहल्लो में दिन में भी मच्छरो का प्रकोप चरम पर रहता है। शहजादपुर में स्थित इन मोहल्लो में दिन मंे भी आसानी से बैठ पाना संभव नहीं हो पा रहा है। टाण्डा नगर पालिका क्षेत्र में भी फागिंग न होने तथा सफाई व्यवस्था लचर होने के कारण कुछ मोहल्लो में मच्छरो की भरमार है। यहीं नहीं, नगर पालिका प्रशासन नालियो की सफाई के प्रति भी जबरदस्त बेपरवाह है। नालियो की सफाई न होने के कारण उसमें भी मच्छरो का प्रजनन जोरशोर से हो रहा है। इन सबके बीच निजी पैथालोजी केन्द्रो पर डेंगू की जांच के नाम पर मरीजो को लूटा जा रहा है। जिला मुख्यालय पर बगैर लाइसेन्स के संचालित हो रहे अनेक पैथालोजी केन्द्रो पर डेंगू की जांच किये जाने का दावा किया जा रहा है। इसके लिए मरीजो से 15 सौ रूपये तक लिया जा रहा है। स्वास्थ्य महकमा ऐसे पैथालोजी केन्द्रो पर भी नकेल कसने में विफल साबित हो रहा है। फिलहाल डेंगू के जांच की सुविधा जिला चिकित्सालय व मेडिकल कालेज में उपलब्ध है। मौजूदा परिस्थ्तिियो में डेंगू जैसी बीमारी पर अंकुश लग पाना संभव नहीं प्रतीत हो रहा है। डेंगू का सर्वाधिक प्रकोप जलालपुर व टाण्डा नगर पालिका क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। डेंगू के लिए आवश्यक पड़ने वाले प्लेटलेट्स को निकालने की सुविधा जिले में नहीं है। इसका लाइसेन्स अभी तक न तो जिला चिकित्सालय को मिल सका और न ही मेडिकल कालेज को। ऐसे में मरीजो को रेफर करने के अलावां चिकित्सको के पास कोई विकल्प नहीं बचता।


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