Friday, 11 November 2016

बाल दिवस पर घनश्याम भारतीय को मिलेगा एवार्ड

                  नियाज़ तौहीद सिद्दीकी

      शोहरतें सबके मुकद्दर में नहीं होती। अज़मतों के लिए ऊपर वाला कुछ शख्सियतों को चुन ही लेता है।इनमे कुछ लोग ऐसे होते हैं जो क्षण भर जहां ठहर जायें वहीं महफिल सज जाती है, और उठ कर चल पडे़ तो तनहा होने के बावजूद भी एक कारवां मालूम होने लगता है।मेरे अत्यंत निकट सम्बन्धी पत्रकार, साहित्यकार व स्तम्भकार घनश्याम भारतीय की भी शख्सियत कुछ ऐसी ही है। जिन्हें आगामी 14 नवम्बर को बाल दिवस के अवसर पर उनकी साहित्यिक खिदमत के चलते लखनऊ में "राजीव गांधी एक्सीलेन्ट एवार्ड" से नवाजा जायेगा।                      
         घनश्याम भारतीय का जन्म 6 फरवरी 1976 को अम्बेडकरनगर जिले के एक ऐसे गांव में हुआ जिसका नाम बड़ा ही गैर शायराना है। जिसे दुलहूपुर के नाम से जाना जाता है।इस साहित्यकार के पिता श्री राम आसरे ऐसे इंसान हैं, जिनसे मिलने पर मोहब्बत बढ़ती जाती है और दूर हो जाये तो दुबारा मिलने के लिए तबीयत बेचैन रहती है। अपनी लेखनी के जरिये आज घनश्याम भारतीय किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। जब उन्होंने  अपनी आंखें खोली तो चारो तरफ गरीबी, मुफलिसी के साये ही दिखायी पड़े।जिनसे जूझते हुए उन्होंने विषम परिस्थितियों में शिक्षा अर्जित की।तमाम अभावों के बावजूद कभी हिम्मत नहीं हारी।परिणाम यह हुआ कि  उनके हृदय की हवेली की खिड़कियों से साहित्य लेखन की एक ऐसी बयार बही कि आज परिवार व समाज का मान बढ़ने के साथ एक बड़ा  तबका उन पर गर्व महसूस करने लगा है। 
       कहते है कि अच्छा लेखक वही होता है जिसको अपनी जमीन, अपनी परम्पराओं और अपने लोगों से मोहब्बत होती है। घनश्याम भारतीय में यह सभी खूबियां है। अगर इनकी साहित्यक व लेखन की दुनिया में झांका जाये तो उनकी मेहनत व स्वस्थ सोच को सलाम करने का जी चाहता है। दो दर्जन कहानियां, आधा दर्जन उपन्यास और सौ से अधिक निबंध का लेखन पूर्ण कर चुके भारतीय जी एक अच्छे साहित्यकार है या निर्भीक पत्रकार....। दोनो में अन्तर करना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि वह जितने प्रखर साहित्यकार हैं उतने ही अच्छे पत्रकार भी हैं।
          वर्तमान में आईपीएन न्यूज एजेन्सी व हिन्दी दैनिक पायनियर में अम्बेडकरनगर जिला मुख्यालय पर संवाददाता के साथ-साथ स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बीते कई वर्षों से देश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टलों में सम-सामयिक लेखन का काम भी कर रहे हैं। पूर्व में अमर उजाला, जनमोर्चा, दैनिक जागरण में तहसील संवाददाता के रूप में समाज की समस्याओं व दबे कुचले लोगों की आवाज को अपनी पत्रकारिता के जरिये बुलंद कर चुके है। एक वर्ष तक पुनर्जागरण पत्रिका में जिला संवाददाता रह चुके भारतीय जी आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए तमाम लोगों को कई बरस की जिन्दगी गुजारनी पड़ती है।         
          खास बात यह कि घनश्याम भारतीय अपनी नवजवानी की उम्र से ही शिक्षा और साहित्य से जुड़ गये थे। शिक्षकों व साहित्य प्रेमियों के बीच में रहने की वजह से उनके व्यक्तित्व में बेइंतहां विनम्रता और नैतिकता शामिल हो गयी थी।जो आज विकसित रूप में कायम है। भारतीय जी का विशाल हृदय धर्म और जाति की सीमाएं बचपन में ही तोड़ चुका है। जिस तरह विभिन्न धर्मों और दर्शनों के तुलनात्मक अध्ययन का उन्हें शौक है उसी तरह अनेक भाषाओं के साहित्य के अध्ययन में भी उनकी विशेष रूचि है। हिन्दी साहित्य में एमए घनश्याम भारतीय उर्दू साहित्य व भाषा को भी सलीके से पढ़ और लिख लेते हैं। उन्हें उर्दू पढ़ाने व सिखाने का सौभाग्य मुझ नाचीज को प्राप्त है। जबकि पत्रकारिता का ककहरा मैंने उन्ही से सीखा है।ऐसे में भारतीय जी जब कभी मुझे गुरू या उस्ताद कहते हैं तो मैं उनकी बात यह कहकर काट देता हूं कि हम एक दूसरे के गुरू भी हैं और शिष्य भी।     
            कुल मिलाकर बड़े भाई की तरह मेरे मार्ग दर्शक घनश्याम भारतीय जी ऐसे साहित्यकार व पत्रकार हैं जिन्हें पढिये तो अच्छे लगते है और करीब बैठिए तो दुुबारा मुलाकात को जी चाहता है। भारतीय जी की सख्शियत के बारे में जितना भी लिखा जाय कम होगा।वास्तव में उनकी जिंदगी आसान होकर भी एक पेचीदा किताब है।जिसे पढ़ना तो आसान है मगर समझना कठिन।कुल मिलाकर उनको मिल रहे इस एवार्ड से पत्रकार समाज गौरवान्वित है।

                       नियाज तौहीद सिद्दीकी                                                                 
                                     पत्रकार
               भियांव, जलालपुर अम्बेडकरनगर 
                           मो0-8090236562

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