Thursday, 3 November 2016

मजदूरी कर परिवार का पेट पाल रहे किताब वाले हाथ

सरकारी योजनाएं बदहाल

कटेहरी, अम्बेडकरनगर (राजीव अग्रहरि) बच्चो की शिक्षा के लिए सरकारे कई योजनाओं के तहत पैसा खर्च कर रही है वहीं दूसरी ओर बढ़ती महगाई और गरीबी के चलते देश के भविश्य कहे जाने वाले नौनिहाल मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का पेट भरने को मजबूर है जबकि बालश्रम कानून के तहत 14 वर्श तक के बच्चों से मजदूरी कराना अपराध है किन्तु बालश्रम कानून सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह गया है। होटलों से लेकर घरों में इन छोटे कम उम्र के बच्चों से काम कराया जा रहा है और प्रशासन की लापरवाही और बढ़ती महगाई और गरीबी के चलते देश का भविश्य अंधकार की तरह अग्रसर हो रहा है।
सरकारे कानून बना तो देती है पर निचले स्तर पर अमल में लाया जा रहा है कि नहीं इस पर निगाह नहीं रखी जाती जिस कारण कानून से डरने वाले लोग भी बेखौफ हो जाते है। बालश्रम कानून तो बनाया गया जिसमें 14 वर्श तक के बच्चों से मजदूरी कराना कानूनन अपराध है लेकिन जब कानून के रखवाले कानून का भच्छक बन जा रहे है तो लोग बेखौफ हो ही जायेंगे। हम बात कर रहे है नौनिहालों की जिनकी उम्र हाथ में कलम लेकर पढ़ाई करने की है वे आज अपने और अपने परिवार का पेट पालन रोड पर फुल्की बेचते व अन्य रोजगार करते नजर आते है। उम्रदराज मजदूर प्रतिदिनके हिसाब से 150 से 200 रूपये लेंगे जब इन कम उम्र के बच्चों को हमारे देश की शासन-प्रशासन जिन्हे देश का भविश्य कहती है कि उनकी अपनी मजबूरी और बेबसी के चलते लोग कम मजदूरी में ही उनसे ज्यादा काम करवा लेते है। होटलों, चाय की दुकानों तथा रेलवे स्टेशनों आदि पर इन नौनिहालों को मजदूरी करते देखा जा सकता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि शासन और प्रशासन के अधिकारियों की नजर इन पर नहीं पड़ती हो किन्तु कांगजो में सिमटा कानून और कागजो में सिमटी सरकार की योजनाएं कब कागजो से बाहर निकल कर इन नौनिहालों के भविश्य अंधकार के सागर से डूब रहे है। बढ़ती महगाई और गरीबी के कारण कुछ बच्चे तो अपने परिवार का पेट पालने के लिए मजबूरी तथा लाचारी का फायदा उठाकर लोग उनका शोशण करने से नहीं चूकते है।

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